tansen biography in hindi

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tansen biography in hindi:-

पूरा नाम – तानसेन  (Ramtanu Pandey ji)
जन्म – 1506
जन्मस्थान – ग्वालियर
पिता – मुकुंद

तानसेन एक इतिहासिक शक्सियत है। उनके पिता मुकुंद मिश्रा एक समृद्ध कवी और लोकप्रिय संगीतकार थे, जो कुछ मय तक वाराणसी के धार्मिक मंदिर में रहते थे। जन्म के समय तानसेन का नाम रामतनु था।

तानसेन का जन्म उस समय में हुआ था जब बहुत से पर्शियन और मध्य एशियाई अनुकल्प भारतीय क्लासिकल संगीत का सम्मिश्रण कर रहे थे। उनके कार्यो और उनकी रचनाओ से ही आधुनिक कवियों को हिन्दुस्तानी क्लासिकल लोकाचार बनाने की प्रेरणा मिली थी।

बहुत से वंशज और अनुयायियों ने उनकी परंपरा को समृद्ध बनाया था। बल्कि आज हमें हर हिन्दुस्तानी घर में हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक में तानसेन का संबंध जरुर दिखाई ही देता है। विद्वानों के अनुसार, जानवरों और पक्षियों के आवाज की प्रतिलिप करने के लिये भी वे इतिहास में काफी प्रसिद्ध थे।

तानसेन जीवन का परिचय :-

केवल 6 साल की अल्पायु में ही तानसेन ने अपने अंदर छुपी संगीत की कला का प्रदर्शन किया था। इसके बाद कुछ समय तक वे स्वामी हरीदास के अनुयायी बने रहे, जो वृन्दावन के विद्वान संगीतकार थे और साथ ही ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर (1486-1516 AD), जो संगीत के ध्रुपद प्रकार में निपुण थे। तानसेन के संगीत के ज्ञान को जल्द ही पहचान लिया गया था।

उस समय में हरिदास को ही सबसे बुद्धिमान और सफल शिक्षक माना जाता था। ऐसा कहा जाता है की तानसेन कभी भी अपने शिक्षक से अलग नही हुए थे। विद्वानों का ऐसा मानना है की एक बार हरिदास जंगल से जुगार रहे थे और तभी उन्होंने रामतनु को गाते हुए देखा था, और उन्हें देखते ही हरिदास मंत्रमुग्ध हो गए थे। बल्कि दुसरे सूत्रों के अनुसार तानसेन के पिता ने तानसेन को हरिदास के पास संगीत के अभ्यास के लिये भेजा था।

हरिदास से तानसेन ने केवल उनकी ध्रुपद कला ही नही सीखी बल्कि स्थानिक भाषा में उनकी संगीत रचना भी सीखी। यह ऐसा समय था जब भक्ति काल धीरे-धीरे संस्कृत से स्थानिक भाषा (ब्रजभाषा और हिंदी) में परिवर्तित हो रहा था। और इस समय तानसेन की रचनाओ ने लोगो को काफी प्रभावित किया था। इसी दौरान कुछ समय के बाद तानसेन के पिता की भी मृत्यु हो गयी थी और इस वजह से तानसेन को घर वापिस आना पड़ा था और कहा जाता है की घर वापिस आ जाने के बाद वे शिव मंदिर में स्थानिक भाषा में भक्तिगीत गाते थे।

इसके साथ ही किसी भी उत्सव में तानसेन मुहम्मद घुस के दरबार में जाते थे और अपनी कला का प्रदर्शन करते थे।

जब तानसेन घुस परंपरा से जुड़े थे तो उससे पहले उन्होंने स्वामी हरिदास से भक्ति गीत का प्रशिक्षण ले रखा था। और उनके समय में तानसेन के कार्य को काफी लोकप्रियता मिली थी। तानसेन की संगीत रचना में हमें ब्रज और हिंदी भाषा का सम्मिश्रण दिखाई देता है। तानसेन ने ज्यादातर भक्ति गीतों की रचना कृष्णा और शिव की भक्ति में ही की है।

ग्वालियर के दरबार में तानसेन दुसरे गायकों से काफी प्रभावित हुए थे और उन्होंने उनसे बहुत कुछ सिखा भी था। तानसेन की संगीत कला ने महारानी मृगनयनी को काफी प्रभावित किया था, बल्कि तानसेन और महारानी अच्छे दोस्त भी बन चुके थे और राजा की मृत्यु के बाद भी वे अच्छे दोस्त थे। ग्वालियर के दुसरे संगीतकारों में बैजू बावरा शामिल है।

परिणामस्वरूप, तानसेन रेवा के राजा रामचंद्र बाघेला के दरबार में शामिल हो गए। जहाँ वे 1555 से 1562 तक रहे। कहा जाता है की इसी समय में मुघल सम्राट अकबर ने तानसेन की कला और प्रतिभा के बारे में सुना था और उन्होंने जलालुद्दीन कुरेची को रामचंद्र के दरबार में तानसेन को लाने के लिये भी भेजा था। और इसके बाद तानसेन अकबर के दरबार में चले गए थे। 57 साल की आयु में 1562 में तानसेन अकबर के दरबार में गए थे।

तानसेन अचानक ही अकबर के दरबार में शामिल हुए थे और जल्द ही अकबर के नौ-रत्नो में से एक बन गए थे। मुघल शासक अकबर ने ही तानसेन को मिया का शीर्षक दिया था और आज भी हम तानसेन को मिया तानसेन के नाम से ही जानते है। इतिहासिक जानकारों के अनुसार अकबर ने तानसेन के पहले कला प्रदर्शन पर इनाम में 100,000 सोने के सिक्के दिये थे।

सदियों से अकबर के दरबार में संगीतकार तानसेन का होना चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन इतिहासिक जानकारों के अनुसार अकबर तानसेन की संगीत कला से काफी प्रभावित थे और इसीलिए उन्होंने तानसेन को अपने नौ-रत्नों में भी शामिल कर लिया था।

इतिहासिक किला फतेहपुर सीकरी अकबर के दरबार में तानसेन के कार्यकाल से काफी हद तक जुड़ा हुआ है। शासक के कमरे के नजदीक ही एक तालाब बनवाया गया था जिसके बिच में एक छोटा द्वीप भी था, जहाँ तानसेन अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। आज इस छोटे तालाब को अनूप तलाव कहते है, जिसे हम दीवान-ए-आम के पास ही देख सकते है।

कहा जाता है की तानसेन दिन में अलग-अलग समय में अलग-अलग मौको पर अलग-अलग राग गाते थे। उनके प्रदर्शन से खुश हुए लोग उन्हें तोहफे में सिक्के भी देते थे। कहा जाता है की किले से तानसेन का घर भी काफी नजदीक ही था।

तानसेन मृत्यु :-

कुछ इतिहासिक सूत्रों के अनुसार तानसेन की मृत्यु 26 अप्रैल 1586 को दिल्ली में हुई थी और अकबर और उनके सभी दरबारी उनकी अंतिम यात्रा में उपस्थित थे। जबकि दुसरे सूत्रों के अनुसार 6 मई 1589 को उनकी मृत्यु हुई थी। उन्हें जन्मभूमि बेहात(ग्वालियर के पास) पर दफनाया गया। यही उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष दिसंबर में तानसेन संगीत सम्मलेन’ आयोजित किया जाता है।

हर साल दिसम्बर में तानसेन की याद में ग्वालियर में तानसेन समारोह का आयोजन किया जाता है।

मिया तानसेन अकबर के लोकप्रिय नवरत्नों में से एक थे। अकबर को संगीत का बहुत शौक था और तानसेन के बारे में अकबर ने बहुत से लोगो से लोगो से उनकी आवाज़ और संगीत कला की प्रशंसा भी सुनी थी, इसीलिए अकबर किसी भी हालत में तानसेन को अपने दरबार में लाना ही चाहते थे बल्कि इसके लिये तो वे युद्ध करने को भी राजी थे। तानसेन के भक्तिगीत आज भी हमें घर-घर सुनाई देते है।

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