kamakhya Temple History in Hindi

kamakhya Temple History in Hindi

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आरंभिक कामरूप के ऐतिहासिक साम्राज्य में वर्मन और क्ष्यण्शनग 7 वी सदी के चीनी यात्री ने कामाख्या की उपेक्षा की क्योंकि तब ऐसा माना जाता था की किराता की ब्राम्हिनी अम्बित की पूजा करनी चाहिए। कामाख्या की पूर्वलिखित सूचना के अनुसार 8 वी – 9 वी सदि मे तेजपुर में मंदिर के पुरातत्वीय सबुत मिले।

लेकिन बाद में कलपहर द्वारा इस मंदिर को नष्ट किया गया यद्यपि हाल ही की जाँच में यह पता चला की हुसैन शाह के राज में भी इस मंदिर को नष्ट किया गया। ये जो विध्वंश हुए उसकी खोज विश्वसिंधा ने की ये कॉच साम्राज्य के निर्माता थे जिनको वहा प्रतिष्ठा मिली पर उनके पुत्र नारायण के शासन में मंदिर का पुन: निर्माण समाप्त हुआ।

इसके निर्माण के लिए जो सामग्री लगी उसे उसी जगह से एकत्रित की गई जँहा पर इसके अवशेष थे। बाद में कुछ नये निर्माण भी किये गये।

कॉच रॉयल बिहार परिवार को स्वयं देवी ने पूजा करने से रोका था। परन्तु कॉच बिहार रॉयल फॅमिली की मदद के बिना मंदिर के निर्माण में बहोत सी बाधाए आयी। 1658 के अंत में जयध्वज सिंह ने निचले आसाम पे कब्ज़ा कर लिया था और मंदिर के निर्माण में भी इच्छुक था। उस दशक में राजा और मंदिर के श्रध्दालु मिलकर मंदिर के निर्माण और मरम्मत के लिए आगे आए थे।

facts about Kamakhya Temple :-

अम्बुबाची पूजा: ऐसी मान्यता है कि अम्बुबाची पर्व के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती है इसलिए तीन दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है तो इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

वर्तमान मंदिर में विभिन्न किंवदंतियों, पौराणिक गाथाओ, हिन्दू धर्म के बहोत से मंदिर और गणेश भगवान के अनोखे चित्र बने है।

3. रोज की पूजाओ के अलावा सती देवी की बहोत सी पूजाए पुरे साल भर इस मंदिर में होती है जैसे दुर्गा पूजा, अम्बुबाची पूजा, पोहन बिया, दुर्गाडियूल पूजा, वसंती पूजा, मडानडियूल पूजा होती है।

दुर्गा पूजा: हर साल सितम्बर-अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान इस पूजा का आयोजन किया जाता है।

नरकासुर को देविने चुनौती दी थी वह चुनौती को पूरा करने ही वाला था की देवी ने मायावी कुक्कुट के साथ मिलकर नरकासुर को हरा दिया जिससे क्रोधित होकर नरका ने उसे मार डाला, तभी से यह स्थापना कुक्कुट के नाम से जानी जाती है। यह दारंग में स्थित है और इस सीढ़ियो को मेखेलाय्जा पथ के नाम से जाना जाता है।

पोहन बिया : पूसा मास के दौरान भगवान कमेस्शवरा और कामेशवरी की बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में यह पूजा की जाती है।

वसंती पूजा: यह पूजा चैत्र के महीने में कामाख्या मंदिर में आयोजित की जाती है।

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