tatya tope history in hindi

history of tatya tope in hindi

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history of tatya tope in hindi :-

पूरा नाम – रामचंद्र पांडुरंग येवलकर
उपनाम – तात्या टोपे
जन्म – 1814
स्थान – नासिक के पास पटोदा जिले के येवला गाँव में
परिजन – पिता पांडुरंग त्रयम्बक और माता रुक्मिणी बाई
मृत्यु – 18 अप्रैल 1859

तात्या टोपे का शुरुआती जीवन – Tatya Tope

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तात्या टोपे को आज भी याद किया जाता है। रानी लक्ष्मी बाई के साथ मिलकर उन्होंने बहुत बड़ी क्रांति देश में स्थापित की थी। उनका जन्म येवला गाँव में हुआ और उनके पिता बाजीराव द्वितीय के यहाँ गृह-सभा का काम देखते थे। उनकी माँ एक कुशल गृहणी थी और वो आठ भाई बहनों में सबसे बड़े थे।

जब अंग्रेज भारत आये तो उन्होंने पेशवा बाजीराव की सल्तनत में आक्रमण किया लेकिन बाजीराव ने उनके सामने घुटने नहीं टेके और अंग्रेजो से लड़ने का फैसला किया लेकिन इसमें उनकी हार हुई। ये समय था लगभग 1820 के आसपास का और हार के बाद बाजीराव को अंग्रेजो ने कानपुर भेज दिया और उन्हें सालाना आठ लाख रुपये की पेंशन देने लगे।

तात्या भी पेशवा के साथ कानपुर के बिठूर चले गए और वही रहने लगे। कुछ समय वह रहने के बाद तात्या ने अंग्रेज सरकार में बंगाल रेजिमेंट में तोपखाने नौकरी भी की लेकिन अंग्रेजी हुकूमत पसंद नहीं आई और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने बाजीराव के गोद लिए बेटे नाना साहेब से ही युद्ध कला बिठूर में ही सीखी।

अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई – Tantia Tope 

अंग्रेजो के खिलाफ तात्या की सबसे अहम् लड़ाई 1857 में कही जाती है। कहा जाता है की पेशवा को मिलने वाली आठ लाख रुपये की पेंशन अंग्रेजो ने अचानक ही बंद कर दी जिसके बाद तात्या और नाना साहेब बहुत नाराज हुए और अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

पूरे देश में चल रहे इस संग्राम के समय तात्या और नाना साहेब (Nana Sahib)ने मिलकर अंग्रेजो में हमला किया लेकिन वो ज्यादा देर तक टिक नहीं पाए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद नाना साहेब हमेशा के लिए नेपाल चले गये और वही उन्होंने अंतिम सांस ली।

इसके बाद भी लगातर कई बार तात्या ने अंग्रेजो पर हमले किये लेकिन उन्हें हार मिली और उनकी सेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया और तात्या को पकड़ने की कोशिश की गई लेकिन वो पकड में नहीं आये और भागने में सफल हुए।

रानी लक्ष्मीबाई के साथ – With Rani Laxmi Bai :-

कहा जाता है की जिस तरह से अंग्रेजो ने नाना साहेब को पेशवा का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया था वैसे ही झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani of Jhansi) के बेटे को भी अंग्रेजो ने उत्तराधिकारी मानने से इंकार किया था और यह बात तात्या को पता चली तो उन्होंने लक्ष्मीबाई का साथ देने का फैसला किया।

कानपुर में नाना ने अंग्रेजो के खिलाफ कई सारे युद्ध किये ही थे लेकिन रानी के साथ मिलकर उन्होंने मध्य भारत में मोर्चा संभाला और ग्वालियर के किले में हमला करके सिंधिया की सेना को परास्त किया और वहां कब्ज़ा कर लिया।

कहते है अंग्रेज इससे बहुत अधिक आहत हुए उन्होंने तात्या और रानी के खिलाफ बहुत बड़ी प्लानिंग बनाई और ग्वालियर में हमला कर दिया। इस हमले में रानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गई लेकिन तात्या भागने में कामयाब रहे। इसके बाद लगातार अंग्रेज तात्या को ढूढने में लगे रहे लेकिन वो पकड़ में नहीं आये।

मौत के दो तथ्य – Tatya Tope Death

कहा जाता है की रानी के शहीद होने के बाद तात्या भागते भागते पाडौन के जंगलो में चले गए जहाँ से मानसिंह ने अंग्रेजो को तात्या के छुपे होने की खबर दी और इसके बाद अंग्रेजो ने तात्या को पकड लिया और साल 1859 में उन्हें फांसी दे दी गई।

तात्या ने अंग्रेजो के नाक में दम कर दिया था और अपने जीवन में उन्होंने 150 युद्ध अंग्रेजो से किये थे। तात्या की याद में भारत सरकार ने बाद में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

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